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क्या PCPNDT Act के तहत पुलिस FIR दर्ज कर सकती है? Section 28, Police Investigation और Court ने क्या कहा?

भारतीय न्यायालय में PCPNDT Act के तहत FIR, पुलिस जांच, Section 28, Appropriate Authority और Magistrate Cognizance की कानूनी प्रक्रिया दर्शाता हुआ इन्फोग्राफिक।

अगर आपने Google पर "क्या PCPNDT Act के तहत पुलिस FIR दर्ज कर सकती है?", "Can Police Register FIR under PCPNDT Act" या "PCPNDT Act FIR" जैसे सवाल खोजे हैं, तो आपने देखा होगा कि हर जगह अलग-अलग जवाब मिलते हैं। कोई कहता है कि पुलिस सीधे FIR दर्ज कर सकती है क्योंकि PCPNDT Act के अपराध Cognizable (संज्ञेय) हैं। वहीं कुछ लोग कहते हैं कि Section 28 PCPNDT Act के कारण पुलिस FIR दर्ज नहीं कर सकती और केवल Appropriate Authority ही कार्रवाई शुरू कर सकती है।

यही वजह है कि इस कानून को लेकर सबसे ज़्यादा भ्रम रहता है। खासकर डॉक्टरों, अल्ट्रासाउंड सेंटर चलाने वालों, वकीलों और कानून के छात्रों के मन में अक्सर यही सवाल आता है कि आखिर सही कानून क्या कहता है?

इस सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Dr. Brij Pal Singh v. State of U.P. & Another मामले में विस्तार से विचार किया। कोर्ट ने यह समझाया कि पुलिस की क्या भूमिका है, Appropriate Authority क्या करती है, पुलिस जांच कर सकती है या नहीं, Charge Sheet दाखिल हो सकती है या नहीं और Magistrate किस आधार पर मामले की सुनवाई शुरू कर सकता है।

इस लेख में हम इन्हीं सभी सवालों का जवाब बहुत आसान भाषा में समझेंगे। अगर आप PCPNDT Act के बारे में पहली बार पढ़ रहे हैं, तब भी आपको पूरा विषय आसानी से समझ में आ जाएगा।

क्या PCPNDT Act के तहत पुलिस FIR दर्ज कर सकती है?  

इस सवाल का जवाब केवल "हाँ" या "नहीं" में देना सही नहीं होगा।

कई लोगों का मानना है कि अगर कोई अपराध Cognizable है, तो पुलिस बिना किसी रोक-टोक के FIR दर्ज कर सकती है और पूरी जांच भी कर सकती है। लेकिन PCPNDT Act में मामला थोड़ा अलग है। इस कानून में Section 28 नाम की एक खास धारा है, जो बताती है कि अदालत इस Act के तहत मामला कब और किसके आधार पर सुन सकती है।

यहीं से पूरा विवाद शुरू होता है।

एक तरफ सामान्य आपराधिक कानून है, जिसके अनुसार Cognizable offence में पुलिस FIR दर्ज करके जांच करती है। दूसरी तरफ PCPNDT Act की अपनी अलग व्यवस्था है, जिसमें Appropriate Authority की भी महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है।

इसी कारण वर्षों से यह सवाल उठता रहा कि—

  • क्या पुलिस FIR दर्ज कर सकती है?
  • क्या पुलिस जांच कर सकती है?
  • क्या पुलिस Charge Sheet दाखिल कर सकती है?
  • या फिर पूरा मामला केवल Appropriate Authority के माध्यम से ही चलेगा?

इन्हीं सभी सवालों का जवाब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Dr. Brij Pal Singh के मामले में विस्तार से दिया है, जिसे हम आगे एक-एक करके बहुत आसान भाषा में समझेंगे।

सबसे पहले यह समझिए कि लोगों में भ्रम क्यों है

जब कोई व्यक्ति पहली बार PCPNDT Act के बारे में पढ़ता है, तो उसे दो अलग-अलग बातें दिखाई देती हैं।

पहली बात यह कि इस Act के कुछ अपराध Cognizable बताए गए हैं। इसका मतलब सामान्य तौर पर यही समझा जाता है कि पुलिस FIR दर्ज कर सकती है और जांच शुरू कर सकती है।

लेकिन दूसरी तरफ Section 28 PCPNDT Act पढ़ने पर ऐसा लगता है कि इस Act के मामलों में अदालत तभी कार्यवाही शुरू करेगी, जब Appropriate Authority या कानून में बताए गए व्यक्ति द्वारा शिकायत की जाएगी।

यहीं पर लोगों के मन में सवाल उठता है—

अगर शिकायत Appropriate Authority करेगी, तो फिर पुलिस FIR क्यों दर्ज करेगी?

और अगर पुलिस FIR दर्ज कर सकती है, तो Section 28 का मतलब क्या रह जाता है?

इसी कानूनी सवाल का जवाब जानना इस पूरे लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगले भाग में हम सबसे पहले समझेंगे कि Section 28 PCPNDT Act आखिर कहती क्या है और इसी धारा से पूरा विवाद क्यों शुरू होता है।

Section 28 PCPNDT Act क्या कहती है और इसी धारा से पूरा विवाद क्यों शुरू होता है?

अगर इस पूरे मामले में किसी एक धारा ने सबसे ज़्यादा भ्रम पैदा किया है, तो वह है Section 28 PCPNDT Act। लगभग हर बहस इसी धारा के आसपास घूमती है।

कई लोग केवल Section 28 पढ़कर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि पुलिस न तो FIR दर्ज कर सकती है और न ही जांच कर सकती है। दूसरी ओर कुछ लोग कहते हैं कि चूंकि PCPNDT Act के अपराध Cognizable हैं, इसलिए पुलिस को सामान्य मामलों की तरह FIR दर्ज करने और जांच करने का पूरा अधिकार है।

यही वजह है कि पहले यह समझना जरूरी है कि Section 28 वास्तव में कहती क्या है।

सरल शब्दों में समझें तो Section 28 यह बताती है कि अदालत (Magistrate) PCPNDT Act के तहत किसी मामले की सुनवाई कब शुरू कर सकती है। यानी यह धारा मुख्य रूप से Cognizance (संज्ञान) से जुड़ी हुई है, न कि सीधे FIR दर्ज करने की प्रक्रिया से।

इस धारा के अनुसार सामान्य रूप से अदालत तभी मामले का संज्ञान ले सकती है, जब Appropriate Authority या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी शिकायत (Complaint) प्रस्तुत करे। कुछ विशेष परिस्थितियों में कोई निजी व्यक्ति भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन करके शिकायत कर सकता है।

यहीं से लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।

अगर अदालत शिकायत के आधार पर ही मामला सुन सकती है, तो फिर पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR का क्या महत्व रहेगा?

क्या पुलिस जांच कर सकती है?

अगर पुलिस जांच कर सकती है, तो क्या वह Charge Sheet भी दाखिल कर सकती है?

और अगर पुलिस Charge Sheet दाखिल कर दे, तो क्या Magistrate उसी के आधार पर मामले की सुनवाई शुरू कर सकता है?

इन्हीं सवालों की वजह से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग राय सामने आई। कई मामलों में आरोपियों ने यह दलील दी कि जब Section 28 शिकायत की बात करती है, तब पुलिस द्वारा दर्ज FIR और पूरी जांच ही कानून के खिलाफ है।

दूसरी ओर राज्य सरकारों का कहना था कि PCPNDT Act के अपराध Cognizable हैं, इसलिए पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच करने से रोका नहीं जा सकता।

इसी कानूनी विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Dr. Brij Pal Singh v. State of U.P. & Another मामले में विस्तार से विचार किया। कोर्ट ने केवल Section 28 को अलग से नहीं पढ़ा, बल्कि पूरे PCPNDT Act, उसके Rules और पहले दिए गए विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों को भी ध्यान में रखा।

यही कारण है कि इस निर्णय को समझे बिना केवल Section 28 पढ़कर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

क्या केवल Section 28 पढ़कर यह कहा जा सकता है कि पुलिस FIR दर्ज नहीं कर सकती?

पहली नज़र में कई लोगों को ऐसा लग सकता है कि Section 28 पुलिस की भूमिका को पूरी तरह खत्म कर देती है। लेकिन अदालत ने साफ कहा कि किसी भी कानून की केवल एक धारा पढ़कर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। पूरे अधिनियम को साथ में पढ़ना जरूरी होता है।

यही वजह है कि अदालत ने यह भी देखा कि PCPNDT Act के अन्य प्रावधान क्या कहते हैं, Rules क्या कहते हैं और पुलिस तथा Appropriate Authority की भूमिका एक-दूसरे से कैसे जुड़ती है।

यानी असली सवाल केवल यह नहीं था कि Section 28 क्या कहती है, बल्कि यह था कि Section 28 को पूरे PCPNDT Act के साथ पढ़ने पर कानून का सही अर्थ क्या निकलता है।

अब अगला सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि Appropriate Authority की भूमिका आखिर क्या है और इस पूरे मामले में उसका महत्व इतना अधिक क्यों है? यही बात हम अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।

Appropriate Authority की भूमिका क्या होती है?

PCPNDT Act को समझने के लिए Appropriate Authority की भूमिका समझना बहुत जरूरी है। अगर आप इस कानून को ध्यान से पढ़ेंगे, तो पाएंगे कि पूरे Act में सबसे अधिक जिम्मेदारी इसी Authority को दी गई है।

सरल शब्दों में कहें तो Appropriate Authority इस कानून को लागू कराने वाली मुख्य सरकारी संस्था होती है। इसका काम केवल शिकायत दर्ज करना ही नहीं, बल्कि यह भी देखना होता है कि कहीं भ्रूण लिंग जांच (Sex Selection) या PCPNDT Act का उल्लंघन तो नहीं हो रहा।

यही Authority अल्ट्रासाउंड सेंटरों का निरीक्षण करती है, रिकॉर्ड की जांच करती है, दस्तावेज़ मांग सकती है, नियमों के पालन की निगरानी करती है और आवश्यकता पड़ने पर आगे कानूनी कार्रवाई भी शुरू करती है।

Appropriate Authority के मुख्य कार्य क्या हैं?

PCPNDT Act के तहत Appropriate Authority को कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। उदाहरण के लिए—

  • अल्ट्रासाउंड सेंटरों का निरीक्षण करना।
  • रिकॉर्ड और दस्तावेज़ों की जांच करना।
  • शिकायत मिलने पर जांच कराना।
  • जरूरत पड़ने पर मशीन, रिकॉर्ड या अन्य सामग्री जब्त करना।
  • Act का उल्लंघन मिलने पर आगे की कानूनी कार्रवाई करना।

यानी इस कानून में Appropriate Authority की भूमिका केवल कागजी नहीं है। उसे जांच और निगरानी से जुड़े कई अधिकार दिए गए हैं।

फिर विवाद कहां से शुरू हुआ?

यहीं पर सबसे बड़ा कानूनी सवाल सामने आया।

जब कानून ने Appropriate Authority को इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है, तो क्या इसका मतलब यह है कि पुलिस की कोई भूमिका ही नहीं बचती?

यही तर्क कई मामलों में अदालतों के सामने रखा गया। आरोपियों की ओर से कहा गया कि जब पूरा Act Appropriate Authority के माध्यम से लागू होना है, तब पुलिस द्वारा FIR दर्ज करना और जांच करना कानून के खिलाफ है।

दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि Appropriate Authority की भूमिका अपनी जगह है, लेकिन इससे पुलिस की शक्तियां अपने आप खत्म नहीं हो जातीं। अगर अपराध Cognizable है, तो पुलिस को जांच करने का अधिकार होना चाहिए।

यही कारण था कि अदालत को यह तय करना पड़ा कि Appropriate Authority और पुलिस—दोनों की भूमिका अलग-अलग है या एक-दूसरे के स्थान पर काम करती हैं।

क्या Appropriate Authority ही FIR दर्ज करती है?

यहीं सबसे ज्यादा गलतफहमी होती है।

बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि Appropriate Authority खुद FIR दर्ज करती है। जबकि PCPNDT Act ऐसा कहीं नहीं कहता।

कानून में Appropriate Authority को शिकायत करने, निरीक्षण करने और कार्रवाई शुरू करने की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि Act की हर प्रक्रिया केवल उसी के माध्यम से चलेगी।

इसी बात को लेकर अलग-अलग न्यायालयों में अलग-अलग राय सामने आई। आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Dr. Brij Pal Singh के मामले में इस पूरे विवाद पर विस्तार से विचार किया और यह समझाने की कोशिश की कि कानून का सही अर्थ क्या है।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल आता है—क्या पुलिस वास्तव में PCPNDT Act के तहत FIR दर्ज करके जांच कर सकती है? यही इस पूरे लेख का सबसे अहम भाग है, जिसे हम अगले हिस्से में विस्तार से समझेंगे।

क्या पुलिस PCPNDT Act के तहत FIR दर्ज कर सकती है?

अब हम इस लेख के सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर आते हैं।

क्या पुलिस PCPNDT Act के तहत FIR दर्ज कर सकती है?

पहली नज़र में इसका जवाब आसान लगता है। क्योंकि PCPNDT Act के कुछ अपराध Cognizable हैं, इसलिए सामान्य रूप से यही माना जाता है कि पुलिस FIR दर्ज कर सकती है। लेकिन जब Section 28 सामने आती है, तो मामला थोड़ा जटिल हो जाता है।

इसी वजह से कई मामलों में यह तर्क दिया गया कि जब कानून में Appropriate Authority के माध्यम से शिकायत करने की व्यवस्था है, तब पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR ही कानून के खिलाफ है।

यही सवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने Dr. Brij Pal Singh v. State of U.P. & Another मामले में भी आया था।

आवेदक की ओर से मुख्य रूप से यह दलील दी गई कि Section 28 PCPNDT Act एक विशेष व्यवस्था (Special Procedure) बनाती है। इसलिए पुलिस द्वारा FIR दर्ज करना, जांच करना और उसके बाद Charge Sheet दाखिल करना कानून के अनुसार नहीं है।

दूसरी ओर राज्य सरकार का कहना था कि PCPNDT Act के अपराध Cognizable हैं। इसलिए पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच करने से नहीं रोका जा सकता।

यानी अदालत के सामने सीधा सवाल था कि क्या Section 28, पुलिस की सामान्य शक्तियों को पूरी तरह खत्म कर देती है?

कोर्ट ने इस सवाल को कैसे देखा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले केवल Section 28 को नहीं पढ़ा। अदालत ने पूरे PCPNDT Act, उससे जुड़े Rules और दूसरे उच्च न्यायालयों के फैसलों का भी अध्ययन किया।

कोर्ट ने यह माना कि किसी भी कानून की केवल एक धारा पढ़कर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। पूरे कानून को एक साथ पढ़ना जरूरी होता है।

यही कारण है कि अदालत ने यह भी देखा कि Act में Appropriate Authority को कौन-कौन से अधिकार दिए गए हैं, पुलिस की सामान्य जांच की शक्तियां क्या हैं और दोनों व्यवस्थाओं को साथ पढ़ने पर कानून का सही अर्थ क्या निकलता है।

अदालत ने अपने निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया, क्योंकि उन मामलों में भी लगभग यही कानूनी प्रश्न उठाया गया था।

क्या केवल FIR दर्ज हो जाने से पूरा मामला अवैध हो जाता है?

यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है।

कई लोग यह मान लेते हैं कि यदि FIR पुलिस ने दर्ज की है, तो पूरा मुकदमा अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन अदालत ने इस मुद्दे को भी विस्तार से देखा।

कोर्ट ने यह समझने की कोशिश की कि FIR दर्ज होने, पुलिस द्वारा जांच करने और अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लेने (Cognizance) — इन तीनों चरणों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

यानी केवल FIR दर्ज होने से ही पूरे मामले की वैधता या अवैधता तय नहीं हो जाती। आगे की कानूनी प्रक्रिया और कानून की विशेष व्यवस्था को भी देखना पड़ता है।

इसी कारण अदालत ने Section 28 की सही व्याख्या करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस जांच, Charge Sheet और Magistrate द्वारा Cognizance—इन सभी प्रश्नों को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

अब अगला सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पुलिस PCPNDT Act के मामलों की जांच (Investigation) कर सकती है? क्योंकि FIR दर्ज होने के बाद सबसे बड़ा कानूनी विवाद जांच की वैधता को लेकर ही सामने आया था। अगले भाग में हम इसी विषय को विस्तार से समझेंगे।

क्या पुलिस PCPNDT Act के तहत जांच (Investigation) कर सकती है?

FIR दर्ज होने के बाद अगला सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस PCPNDT Act के मामलों की जांच भी कर सकती है? यही वह मुद्दा था जिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सबसे अधिक बहस हुई।

आवेदक की ओर से यह कहा गया कि चूंकि Section 28 PCPNDT Act में Appropriate Authority द्वारा शिकायत करने की व्यवस्था दी गई है, इसलिए पुलिस को न तो जांच करने का अधिकार है और न ही Charge Sheet दाखिल करने का।

दूसरी ओर राज्य सरकार का कहना था कि PCPNDT Act के अपराध Cognizable हैं। इसलिए जब किसी Cognizable offence की जानकारी पुलिस को मिलती है, तो सामान्य आपराधिक कानून के अनुसार पुलिस FIR दर्ज करके जांच कर सकती है।

यही कानूनी विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने था।

कोर्ट ने इस मुद्दे पर क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि FIR दर्ज करने, पुलिस द्वारा जांच करने और Magistrate द्वारा Cognizance लेने—इन तीनों बातों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। हर चरण का अपना अलग कानूनी महत्व है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल Section 28 को पढ़कर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुलिस की पूरी जांच ही अवैध हो जाएगी। कानून की सही व्याख्या करने के लिए पूरे PCPNDT Act को एक साथ पढ़ना आवश्यक है।

निर्णय में अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट तथा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों का भी उल्लेख किया, जिनमें इसी प्रकार के प्रश्नों पर विचार किया गया था।

कोर्ट ने यह माना कि जांच (Investigation) और अदालत द्वारा Cognizance लेना दो अलग-अलग चरण हैं। इसलिए यदि पुलिस ने जांच की है, तो केवल इसी आधार पर पूरी कार्यवाही अपने आप अवैध नहीं हो जाती।

फिर Section 28 का महत्व क्या रह जाता है?

यहीं सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है।

Section 28 का उद्देश्य यह बताना है कि अदालत किस आधार पर PCPNDT Act के तहत मामला सुनना शुरू करेगी। यानी यह धारा मुख्य रूप से Cognizance से जुड़ी हुई है।

इसका मतलब यह नहीं है कि Section 28 पढ़ते ही पुलिस की हर कार्रवाई अपने आप खत्म हो जाती है। बल्कि यह देखना पड़ता है कि अदालत के सामने मामला किस तरीके से पहुंचा है और कानून की आवश्यक शर्तों का पालन हुआ है या नहीं।

इसी कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस जांच और अदालत द्वारा Cognizance लेने के बीच स्पष्ट अंतर किया।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल बचता है—क्या पुलिस PCPNDT Act के मामलों में Charge Sheet दाखिल कर सकती है और क्या Magistrate उस Charge Sheet के आधार पर Cognizance ले सकता है?

यही प्रश्न इस पूरे निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे हम अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आखिर क्या फैसला दिया?

अब हम इस पूरे मामले के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर आते हैं।

काफी देर तक दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अलग-अलग हाईकोर्ट के फैसलों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि Section 28 PCPNDT Act को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि पुलिस की FIR और जांच पूरी तरह अवैध हो जाए।

कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करना, पुलिस द्वारा जांच करना और Magistrate द्वारा Cognizance लेना—ये तीनों अलग-अलग चरण हैं। इन्हें एक जैसा नहीं माना जा सकता। 

क्या पुलिस FIR दर्ज कर सकती है?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के Hardeep Singh मामले का उल्लेख करते हुए बताया कि Appropriate Authority की शिकायत पर पुलिस FIR दर्ज कर सकती है और उसकी जांच भी कर सकती है। 

इसका मतलब यह है कि केवल यह कहकर FIR को अवैध नहीं माना जा सकता कि मामला PCPNDT Act का है।

क्या पुलिस Charge Sheet दाखिल कर सकती है?

यहीं सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

कोर्ट ने बताया कि पुलिस जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार कर सकती है। लेकिन PCPNDT Act के अपराधों में केवल पुलिस की Charge Sheet के आधार पर Magistrate सीधे Cognizance नहीं ले सकता। 

ऐसे मामलों में कानून यह चाहता है कि Appropriate Authority स्वयं या अपने अधिकृत अधिकारी के माध्यम से शिकायत (Complaint) अदालत में प्रस्तुत करे। उसी शिकायत के आधार पर अदालत आगे की कार्यवाही शुरू कर सकती है। 

Section 28 का असली मतलब क्या है?

बहुत से लोग Section 28 को पढ़कर यह समझ लेते हैं कि पुलिस का कोई रोल ही नहीं है। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह धारा मुख्य रूप से Magistrate द्वारा Cognizance लेने से संबंधित है।

दूसरे शब्दों में कहें तो Section 28 पुलिस की जांच पर रोक नहीं लगाती, बल्कि अदालत को यह बताती है कि वह PCPNDT Act के अपराधों का संज्ञान किस आधार पर ले सकती है। 

Rule 18A(3)(iv) के बारे में कोर्ट ने क्या कहा?

आवेदक की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि Rule 18A(3)(iv) के अनुसार पुलिस को PCPNDT Act के मामलों की जांच में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि Rule में "as far as possible" शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस की भूमिका पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। यह केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश है कि जहां संभव हो, Appropriate Authority स्वयं जांच करे।

अगर किसी मामले में पुलिस की सहायता की आवश्यकता हो, तो केवल Rule 18A का हवाला देकर पूरी FIR या जांच को अवैध नहीं कहा जा सकता। 

अब तक की सबसे महत्वपूर्ण बात

अब तक की चर्चा से एक बात साफ हो जाती है कि PCPNDT Act में FIR, पुलिस जांच और Court द्वारा Cognizance तीन अलग-अलग कानूनी चरण हैं।

यही कारण है कि किसी भी मामले में केवल FIR दर्ज होने या पुलिस जांच करने से यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी कार्यवाही कानून के खिलाफ है। दूसरी ओर, Magistrate को यह भी देखना होगा कि Section 28 की शर्तों का पालन हुआ है या नहीं।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह बचता है कि Dr. Brij Pal Singh के मामले में आखिर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की या खारिज कर दी और उसका अंतिम कारण क्या था? यही हम अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।

आखिर Dr. Brij Pal Singh के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या अंतिम फैसला दिया?

अब तक हमने यह समझा कि PCPNDT Act में FIR, पुलिस जांच और Court द्वारा Cognizance तीन अलग-अलग चरण हैं। अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि Dr. Brij Pal Singh के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आखिर क्या अंतिम निर्णय दिया।

कोर्ट ने सबसे पहले अलग-अलग हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का अध्ययन किया। इसके बाद उसने प्रत्येक कानूनी प्रश्न का अलग-अलग उत्तर दिया। 

कोर्ट ने FIR के बारे में क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने अंतिम निष्कर्ष में कहा कि PCPNDT Act के अपराधों के लिए सामान्य रूप से पुलिस FIR दर्ज नहीं कर सकती।

यदि पुलिस को PCPNDT Act के उल्लंघन की जानकारी मिलती है, तो उसका कर्तव्य है कि वह यह सूचना Appropriate Authority को दे। इसके बाद जांच और आगे की कार्रवाई उसी Authority द्वारा या उसके अधिकृत अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए। 

कोर्ट ने यह भी कहा कि विशेष कानून (Special Act) में जब यह स्पष्ट कर दिया गया है कि कार्रवाई कौन शुरू करेगा, तब सामान्य पुलिस उसी तरीके से FIR दर्ज करके जांच शुरू नहीं कर सकती, जैसा सामान्य आपराधिक मामलों में होता है। 

क्या पुलिस की Charge Sheet पर Magistrate सीधे Cognizance ले सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर अदालत ने स्पष्ट शब्दों में "नहीं" दिया।

कोर्ट ने कहा कि Section 28 PCPNDT Act के कारण Magistrate केवल पुलिस द्वारा दाखिल की गई Charge Sheet के आधार पर PCPNDT Act के अपराधों का Cognizance नहीं ले सकता।

यदि Appropriate Authority की विधि अनुसार शिकायत (Complaint) अदालत के सामने नहीं है, तो केवल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। 

अगर बाद में Appropriate Authority शिकायत दाखिल कर दे, तब क्या होगा?

इस मामले में राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि बाद में Appropriate Authority ने अलग से Complaint दाखिल कर दी थी, इसलिए पहले हुई कमी दूर हो गई।

लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि यदि पहले ही केवल पुलिस की Charge Sheet पर Cognizance ले लिया गया है, तो बाद में अलग Complaint दाखिल कर देने से वह कमी अपने आप दूर नहीं हो जाती। ऐसा करने से एक ही घटना के लिए दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं चलने लगेंगी, जो कानून का उद्देश्य नहीं है। 

इस निर्णय से क्या कानूनी सिद्धांत निकलता है?

इस पूरे निर्णय से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है।

PCPNDT Act एक Special Law है। इसलिए जहां इस Act ने अलग प्रक्रिया निर्धारित की है, वहां उसी प्रक्रिया का पालन करना होगा।

अगर कानून कहता है कि Magistrate केवल Appropriate Authority की Complaint पर ही Cognizance ले सकता है, तो केवल पुलिस की Charge Sheet उस Requirement को पूरा नहीं कर सकती।  

इस लेख का निष्कर्ष

यदि केवल एक पंक्ति में इस पूरे निर्णय को समझना हो, तो वह यह होगी—

PCPNDT Act के मामलों में सामान्य आपराधिक मामलों जैसी प्रक्रिया लागू नहीं होती। इस कानून में Appropriate Authority की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है और Section 28 का पालन किए बिना Magistrate PCPNDT Act के अपराधों का Cognizance नहीं ले सकता। 

यही कारण है कि PCPNDT Act से जुड़े मामलों में यह देखना हमेशा जरूरी होता है कि शिकायत किसने की, जांच किसने की और अदालत ने Cognizance किस आधार पर लिया। कई बार पूरा मामला इन्हीं कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है।

क्या यह फैसला हर PCPNDT Act के मामले में लागू होगा?

इस निर्णय को पढ़ने के बाद कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि क्या अब हर PCPNDT Act के मामले में पुलिस की FIR और Charge Sheet अपने आप अवैध मानी जाएगी?

इसका उत्तर "नहीं" है।

किसी भी न्यायालय के निर्णय को समझते समय यह देखना जरूरी होता है कि अदालत ने फैसला किन तथ्यों (Facts) और किन कानूनी प्रश्नों के आधार पर दिया है। हर मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी एक निर्णय को हर मामले में बिना सोचे-समझे लागू नहीं किया जा सकता।

Dr. Brij Pal Singh के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से यह देखा कि Section 28 PCPNDT Act का पालन हुआ या नहीं, Magistrate ने Cognizance किस आधार पर लिया और क्या कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई थी।

इसलिए यदि किसी दूसरे मामले में तथ्य अलग हैं, Appropriate Authority की भूमिका अलग रही है या कानूनी प्रक्रिया अलग तरीके से पूरी हुई है, तो उसका परिणाम भी अलग हो सकता है।

डॉक्टरों और अल्ट्रासाउंड सेंटर चलाने वालों के लिए यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

PCPNDT Act के तहत कार्रवाई होने पर सबसे पहले कई डॉक्टर यही जानना चाहते हैं कि पुलिस की क्या भूमिका है और Appropriate Authority की क्या जिम्मेदारी है।

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन दोनों की भूमिका को अलग-अलग समझाया है और यह स्पष्ट किया है कि Section 28 को नजरअंदाज करके कार्यवाही नहीं की जा सकती।

हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि PCPNDT Act के मामलों में कार्रवाई नहीं हो सकती। यदि कानून में बताई गई प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया जाता है, तो संबंधित Authority आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

इस लेख से क्या समझना चाहिए?

अगर पूरे लेख का सार एक साथ समझें, तो निम्न बातें सामने आती हैं—

  • PCPNDT Act एक विशेष कानून (Special Law) है।
  • इस कानून में Appropriate Authority की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
  • Section 28 यह बताती है कि Magistrate किस आधार पर मामले का Cognizance ले सकता है।
  • हर PCPNDT Act के मामले में सामान्य आपराधिक कानून की प्रक्रिया स्वतः लागू नहीं मानी जा सकती।
  • किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष उसके तथ्यों और कानून के पालन पर निर्भर करेगा।

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महत्वपूर्ण कानूनी स्रोत (Important Legal Sources)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

क्या PCPNDT Act के तहत पुलिस सीधे FIR दर्ज कर सकती है?

यह प्रश्न हर मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है। इस विषय पर अलग-अलग न्यायालयों ने विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग निर्णय दिए हैं। इसलिए किसी भी मामले में उसकी परिस्थितियों को देखकर ही कानूनी राय लेनी चाहिए।

Section 28 PCPNDT Act क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि यह धारा बताती है कि अदालत PCPNDT Act के तहत किसी मामले का Cognizance किन परिस्थितियों में ले सकती है।

Appropriate Authority कौन होती है?

यह वह सरकारी प्राधिकरण होता है जिसे PCPNDT Act के पालन, निरीक्षण और आवश्यक कानूनी कार्रवाई के लिए नियुक्त किया जाता है।

क्या केवल पुलिस की Charge Sheet के आधार पर PCPNDT Act का मुकदमा चल सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर मामले के तथ्यों और लागू न्यायिक निर्णयों पर निर्भर करता है। इसलिए किसी विशेष मामले में संबंधित न्यायालय के निर्णय और कानूनी प्रक्रिया को देखना आवश्यक होता है।

यदि आप PCPNDT Act की किसी विशेष धारा, FIR, जांच, Appropriate Authority, Charge Sheet या किसी न्यायालय के निर्णय के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो इस श्रृंखला के अन्य लेख भी अवश्य पढ़ें।

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नोट: इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी देने के उद्देश्य से लिखे गए हैं। किसी विशेष मामले में उचित कानूनी सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श अवश्य करें।

About the Author

Abdul Qadir - Founder of Judicial Typing Works

Abdul Qadir

Legal Drafting Assistant | Founder of Judicial Typing Works

Abdul Qadir is the Founder of Judicial Typing Works and has extensive practical experience in legal drafting, legal typing, court documentation, and legal translation. He regularly assists advocates and litigants in preparing writ petitions, bail applications, criminal and civil matters, affidavits, appeals, revisions, and other court documents. Through this website, his mission is to explain complex legal concepts in simple, practical language so that litigants, law students, and legal professionals can better understand their legal rights and court procedures.

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Seat No. 7, Basement, Shyam Kripa Restaurant,
Opposite Gate No. 4, High Court,
Prayagraj (Allahabad), Uttar Pradesh – 211001

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